Zindagi Poetry by Neha Singh

                              Poet Name: NEHA SINGH , Poetry from : Sneh Ke Panne (buy here)

            ज़िन्दगी

‌आईने ने भी नजरें झुका लेता है

मेरे दर्द को देखकर

वह तो जिंदगी थी

जिसने मुझे सर उठा कर जीना सिखाया

वरना खफा है वो लोग

मेरे बुलंद हौसलों को देखकर

मयस्सर नहीं मुझे कुछ भी

फिर भी तेरी खुशियां मागती हूं

बस एक ख्वाब है

उस ख्वाब का हक मांगती हूं

हां माना कि लोग मुझे तोड़ सकते हैं

पर मैं अपने आप खुलती हूं

क्योंकि मैं जिंदगी जीना चाहती हूं

हां मैं जिंदगी जीना चाहती हूं

मैं एक खुली किताब सी हूं

और किताब मेरी जिंदगी

जिसके हजारों पन्ने

मैने अभी तक पढ़े नहीं

और जो पढ़े उनकी कद्र नहीं हुई

माना कि हर कोई ज़िन्दगी जीना चाहता है

मगर मैं जिंदगी के सफर में एक ख्वाहिश बनना चाहती हूं

जानती हूं मशरूफ है लोग नेह की वाह वाह में

लुफ्त होना मुझे भी आता है अपनी हर एक आह में जिंदगी है साहब

इसे मैं खुले आसमान में

ख्वाबो संग जीना चाहती हूं

हां मैं जिंदगी जीना चाहती-२

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